फ़िल्मी संगीतकारों ने कहीं कहीं तो करिश्मा ही कर दिया है.
1955 में बनीं फ़िल्म सीमा का ये गीत ले लीजिये ...सुनो छोटी सी गुड़िया की लम्बी कहानी. गीतकार हैं शैलेंद्र और संगीतकार शंकर-जयकिशन. भव्य आर्केस्ट्राइज़ेशन के नामचीन संगीतकार. सिचुएशन के मुताबिक एस.जे. ने हमेशा कुछ इतना बेजोड़ दिया है कि उनका काम सुनिये तो कुछ और पसंद नहीं आता.राग भैरवी(मूलत:प्रात:कालीन राग) को सदा सुहागन राग इसलिये कहा गया है कि आप इसे कभी भी गाइये,लेकिन इतना ख़याल रहे कि इसके बाद आप कुछ गाने का जोखिम नहीं ले सकते. भैरवी हो गई यानी मामला खल्लास.एस.जे. ने जिस तरह से अपने बैंचमार्क (एकाधिक वाद्यों वाला आर्केस्ट्रा) का विचार यहाँ ख़ारिज किया है वह चौंकाता है लेकिन वजह यह कि हाथ में सरोद लेकर बैठे हैं उस्ताद अली अकबर ख़ाँ साहब. सरोद के तारों को कुछ ऐसा छेड़ते हुए कि अच्छा सा अच्छा पत्थर दिला इंसान इन सुरों को सुन कर पिघल जाए.गीत हसरत जयपुरी का लिखा हुआ है और शब्दों की लाजवाब कारीगरी का का नमूना है. सरोद की तरबों पर छेड़े भैरवी के स्वर कितना कुछ कहते हैं.
लता मंगेशकर यहाँ अपने करिश्माई गायन से एक और सोपान रच गईं हैं.सरोद के प्री-ल्यूड पर वे जिस तरह से आमद लेतीं है वह विलक्षण है.सुनो शब्द में जिस तरह से साँस समाहित हुई है वह सुनने वाले को पूरा गीत सुनने को विवश कर देती है. सरोद पर लता भारी है या लता पर सरोद यह निर्णय मैं आप पर ही छोड़ता हूँ...मेरी राय जानना चाहेंगे तो मैं कहूँगा सरोद अतीत की ज़मीन बना रहा है और उस पर लता का सुरीला स्वर आपकी उंगली पकड़ कर कहानी सुनाने का काम कर रहा है.
पुराने ज़माने के ये गीत हमें जिलाए रखते हैं.याद दिलाते हैं कि हमारी विरासत क्या है.हम किस तहज़ीब के नुमाइंदे हैं.अपनी उम्र को घटाने के लिये ऐसे ही गीत समय के पहिये को उल्टा फिरा देते हैं....आप सहमत हैं न मुझसे.