पं.मुकुल शिवपुत्र गान-शिरोमणि
पं.कुमार गंधर्व के ज्येष्ठ चिरंजीव है.बचपन से ही उन्हें सुर की संगत घर आंगन में ही मिली. सूफ़ियाना तबियत के मुकुलजी ऐसे गायक हैं जिन्हें अपने आपको बताने और अपना गाना सुनाने की कोई उत्तेजना नहीं है. मन लग गया गाने को तो गाएंगे,आपके जी में आए जो कर लीजिये. जैसे एक कलाकार होता है फ़क्कड़ तासीर और बिना किसी उतावली वाला , बस वैसे ही हैं मुकुलजी. वे तो ऐसे कलाकार हैं कि बस अपने आप को सुनना चाहते हैं कि आज परमात्मा का क्या आदेश है मेरे गले के लिये.
राग तिलक-कामोद में आपने कोयलिया बोले अमुआ की डागरिया तो सुनी है,आज सुनिये इसी राग में पं.मुकुल शिवपुत्र का ये तसल्ली भरा गायन.छोटी छोटी गमक से सजा गायन और गले से ख़ूशबू बिखेरती ,लहकती तानें.कैसा अनुपम आलोक बिखेरता है ऐसा गायन.न ज़्यादा , न कम , बस वैसा जैसा गाना होना चाहिये एकदम वैसा.