Showing posts with label कुमार गंधर्व. Show all posts
Showing posts with label कुमार गंधर्व. Show all posts

Wednesday, January 13, 2010

चिरकुमार है यह प्रभाती:कुमार गंधर्व तराना

बीता दिन पं. कुमार गंधर्व की याद दिलाता रहा. 12 जनवरी को ही हमसे विदा हुए थे कुमारजी. लेकिन विदा कहाँ हुए. वे तो पूरे ठाठ से अपनी रसपूर्ण गायकी के साथ हमारे मन एक जीवंत दस्तावेज़ बन मौजूद हैं. अठारह बरस बाद भी हम कुमारजी को भूले नहीं. कबाड़ख़ाना पर जीवनसिंह ठाकुर का सुन्दर आलेख तो जारी कर ही चुका था, मन में ही बसे कुमारजी जैसे प्रतिप्रश्न कर बैठे कि भाई विदा होने के दूसरे दिन परभात्या (मालवी शब्द जो प्रभाती का सुरीला अपभ्रंश है)नहीं होना चाहिये क्या. सो लीजिये कुमारजी की ही मान लेते हैं और सुनते हैं राग श्री में निबध्द तराना....अहा! क्या तो सुरों की फ़ैंक है और क्या मदमस्त लयकारी. छोटी छोटी तानों से कुमार कैसे खेलते हैं जैसे कोई तितली एक ही पौधे पर खिले एक फूल से दूसरे फूल की सैर कर लेती है.
रेकॉर्डंग छोटी से है लेकिन मनभावन और अदभुत भी.सुनिये तो ज़रा....

(और हाँ समय हो तो कबाड़ख़ाना की सैर कल लीजियेगा;छोटा सा मगर अदभुत स्मृति-चित्र है)


Get this widget | Track details | eSnips Social DNA

Sunday, September 14, 2008

कुमार गंधर्व गायकी के सुघड़ तेवर दिखाता मुकुल शिवपुत्र का स्वर

पं.मुकुल शिवपुत्र गान-शिरोमणि पं.कुमार गंधर्व के ज्येष्ठ चिरंजीव है.बचपन से ही उन्हें सुर की संगत घर आंगन में ही मिली. सूफ़ियाना तबियत के मुकुलजी ऐसे गायक हैं जिन्हें अपने आपको बताने और अपना गाना सुनाने की कोई उत्तेजना नहीं है. मन लग गया गाने को तो गाएंगे,आपके जी में आए जो कर लीजिये. जैसे एक कलाकार होता है फ़क्कड़ तासीर और बिना किसी उतावली वाला , बस वैसे ही हैं मुकुलजी. वे तो ऐसे कलाकार हैं कि बस अपने आप को सुनना चाहते हैं कि आज परमात्मा का क्या आदेश है मेरे गले के लिये.

राग तिलक-कामोद में आपने कोयलिया बोले अमुआ की डागरिया तो सुनी है,आज सुनिये इसी राग में पं.मुकुल शिवपुत्र का ये तसल्ली भरा गायन.छोटी छोटी गमक से सजा गायन और गले से ख़ूशबू बिखेरती ,लहकती तानें.कैसा अनुपम आलोक बिखेरता है ऐसा गायन.न ज़्यादा , न कम , बस वैसा जैसा गाना होना चाहिये एकदम वैसा.


Get this widget | Track details | eSnips Social DNA

Tuesday, August 19, 2008

पं.कुमार गंधर्व - मंगल दिन आज ; बना घर आयो

मालवा के लोक संगीत में शास्त्रीय रागों की असीम संभावना तलाशने वाले
कुमारजी ने एक तरह से मालवा को वैश्विक पहचान दी . प्रस्तुत रचना राग
मालावति में निबध्द है जिसमें कुमारजी ने मालवी बंदिश को पिरो दिया है.
कलाकार हमेशा अपने कलाकर्म से संगीतप्रेमियों के दिलो-दिमाग़ में अमर रहता है
यह बात कुमारजी को सुनकर सहज ही महसूस किया जा सकता है. छोटी छोटी लेकिन सुघड़ तानों से कुमारजी कैसे एक सुरीला वितान रचते है आइये सुनते हैं.



बदिश का भाव यह है कि बना यानी दूल्हा घर आया है सो आज का दिन मंगलमय हो गया है. बनरा(बन्ना यानी दूल्हा)सहेलियाँ देख आईं है और मैं बावरी हो कर ये गीत गाने लगी हूँ..मंगल दिन आज बना घर आयो.