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Sunday, June 19, 2011

रोमांचित करता वर्षा गीत - डर लागे चमके बिजुरिया



आसमान में बादल घिर आये हैं. बिजली की चमक हो रही है. और ऐसे में यदि स्वर-कोकिला और सुकंठी लता मंगेशकर के स्वर में यह रचना आपको सुनने को मिल जाये तो समझिये सावन कुछ पहले ही आपके मन आँगन में मचल उठा है. हिन्दी चित्रपट की गीतिधारा में वर्षा गीतों की एक लम्बी फ़ेहरिस्त है लेकिन ये गीत न जाने क्यूँ विलक्षण ही बन पड़ा है. गीत रचना के अनुरूप बंदिश में मल्हार का रंग तो है ही लेकिन उस पर छा जाती लताजी की आवाज़ जैसे विरहिणी की विवशता का भावुक बयाँ कर रही है.पं.भरत व्यास का यह गीत चित्रपट गीतों की परम्परा में एक अनमोल दस्तावेज़ है. संगीतकार हैं वसंत देसाई जिन्होंने अपने रचना संसार में अमूमन शास्त्रीय संगीत का शानदार उपयोग किया है. उन्होंने ही बोले रे पपिहरा (फ़िल्म:गुड्डी) जैसा अविस्मरणीय गीत भी तो सिरजा है जिसकी भावभूमि भी मल्हार अंग के राग में निबध्द है. मेरे मालवा में अभी मानसून इंतज़ार करवा रहा है. उम्मीद करें कि गीत को सुनकर मेघराज भी कृपा करेंगे और हमारे घर-आँगन में अपनी प्रसन्नता ज़ाहिर करने आ जाएंगें.


Friday, August 15, 2008

अब डरने की कोई बात नहीं ; अंग्रेज़ी छोरा चला गया एक दुर्लभ गीत

बहुत दिनों से मन था कि एक ब्लॉग सिर्फ़ संगीत को लेकर बना लिया जाए.
मन ने आज कहा कि पन्द्रह अगस्त से बेहतर शुभ दिन और क्या हो सकता है इस नेक काम के लिये.तो लीजिये साहब बिसमिल्लाह करता हूँ.उम्मीद है आपकी मुहब्बते और मशवरे मिलते रहेंगे.मुलाहिज़ा फ़रमाएँ सुर-पेटी की पहली पेशकश.


चाहे आज़ादी मिले हमें साठ से ज़्यादा बरस का समय हो गया लेकिन जिस तरह से अंग्रेज़ों ने हमें ग़ुलाम बना कर रखा था वह हमारे इस महान देश का दर्दनाक अध्याय है.जब देश को आज़ादी मिली तो पूरे देश ने इसका जश्न मनाया. फ़िल्म संगीत में भी कुछ ऐसी बेजोड़ रचनाएँ रचीं गईं जिन्होंने अवाम में स्वर को अभिव्यक्त किया. फ़िल्म संगीत हमेशा जनरूचि को ध्यान में रख कर रचा जाता रहा है इसीलिये वह संगीत की दीगर विधाओं से ज़्यादा लोकप्रिय है.राष्ट्रीयता को लेकर अनेक गीत रचे गए हैं लेकिन आज जो गीत आप सुनने जा रहे हैं वह इस लिहाज़ से विशिष्ट है कि इस गीत के बाद लता मंगेशकर का नाम सुर्ख़ियों में आ गया था. ध्वनि-मुद्रिकाओं के संकलनकर्ता सुमन चौरसिया बताते हैं कि संगीतकार ग़ुलाम हैदर द्वारा कम्पोज़ किये गए फ़िल्म मजबूर (1948) के इस गीत को मुकेश और लता ने गाया है. बहुत आसान शब्द हैं जो सुनने वाले को आनंदित कर देते हैं.भारत के लोकजीवन में गाए बजाने जाने वाले गीत की रंगत आपको इस रचना में सुनाई देगी. गीतकार हैं नज़ीम पानीपती.एक ख़ास बात ; जब इस गीत को सुनें तो लताजी की आवाज़ की ताज़गी पर ज़रूर ग़ौर करियेगा.मुकेश का स्वर भी आपको अधिक मीठा सुनाई देगा.
एक गुज़ारिश: जब इस गीत सुनें तो हमारे अमर सेनानियों को भी याद करें;क्योंकि आज यदि आप हम आज़ाद हवा में सांस ले पा रहे हैं तो ये उन्ही सपूतों की क़ुरबानियों से संभव हो पाया है.क्या ही अच्छा हो कि आप हम सब देश-प्रेम के जज़्बे को सिर्फ़ पंद्रह अगस्त से कुछ और अधिक विस्तृत कर पाएं.वंदेमातरम.