Sunday, June 28, 2009

मैं तो साँवरे के संग राची-कौशिकी चक्रवर्ती.


पटियाला घराने की गायकी के अनुगामी पं.अजय चक्रवर्ती की यशस्वी सुर-पुत्री कौशिकी
के गले में अपने पिता-गुरू की सारी ख़ूबियाँ मौजूद हैं.वे जब जो गा रहीं है तो अपनी एक विशिष्ट छाप छोड़ देतीं हैं.अल्पायु में ही उन्हें नाम,शोहरत और प्रतिष्ठित मंच मिलने लग गए थे. आज सुर-पेटी पर राग मिश्र तिलंग में निबध्द भजन कौशिकी के स्वर में सुरभित हो रहा है. यह मीरा-भजन न जाने कितनी बार कितनी ही गायिकाओं से आपने सुना होगा लेकिन यहाँ कौशिकी के स्वरों का अंदाज़ ही कुछ निराला है.क्लासिकल म्युज़िक से जुड़े होने के बाद भी जब वे भजन गा रहीं हैं तो शब्द की शुध्दता को क़ायम रख रहीं हैं.जहाँ भी उन्होंने किसी पंक्ति को एक ख़ास घुमाव दिया है वहाँ वह लाज़मी सा लगता है. आइये कौशिकी को सुनें

Kaushiki Chakrabar...

6 comments:

मानसी said...

ऐसे सधे हुये स्वर, क्या कहना कौशिकी का। पंडित अजय चक्रवर्ती की सही मायने में स्वरों की उताराधिकारिणी।

इस प्रस्तुति का धन्यवाद।

राकेश जैन said...

sundar !!! aatma mugdh kar dia !! saabhar

यारा said...

surpeti 'afeem' ho gaya hai mere liye....jab bhi antarjaal pe hota hun...ek chakkar jarur lag jata hai yahan ka...... is ummeed me ki aaj kya daulat luta rahe hain snjay bhai........


kaushki nayab hain.

dil se badhai.

awdhesh p singh
Indore
93292 31909

दिलीप कवठेकर said...

बहुत श्रवणीय रचना.

स्वर पूर्णतयः सधे हुए, मीठी और भावपूर्ण अदायगी. आवाज में खनक , और मेच्युरिटी है.

धन्यवाद

सागर नाहर said...

वाह.. बहुत ही सुन्दर स्वर।

Bibek Ranjan Basu said...

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