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Monday, November 23, 2009

आरती अंकलीकर के स्वर में एक सुन्दर रचना


जयपुर अतरौली घराने की नुमाइंदगी करने वाली युवा गायिका आरती अंकलीकर भारतीय शास्त्रीय संगीत परिदृष्य की लोकप्रिय कलाकार हैं.शास्त्रीय और उप-शास्त्रीय संगीत दोनो ही विधाओं में उन्हें सुनना हमेशा विस्मय और सुक़ून देता है. अभी हाल ही में वे इन्दौर तशरीफ़ लाईं जिसके बारे में अपने ब्लॉग एक मुलाक़ात में जल्द ही लिखूंगा..फ़िलहाल इस रचना का आनंद लीजिये.शब्द के अनुरूप भाव को ढालने से ही कविता निहाल हो जाती है. दिव्य स्वर का स्पर्श कितना कुछ बदल देता है किसी बंदिश को ये आप यहाँ महसूस करेंगे.मालूम होवे के आरती गान-सरस्वती किशोरी अमोणकर की शिष्य हैं और फ़िल्म सरदारी बेग़म में सफल गायन कर चुकीं हैं.



Aarti Ankalikar - More Baanke Chhaliya .mp3
Found at bee mp3 search engine

Sunday, June 28, 2009

मैं तो साँवरे के संग राची-कौशिकी चक्रवर्ती.


पटियाला घराने की गायकी के अनुगामी पं.अजय चक्रवर्ती की यशस्वी सुर-पुत्री कौशिकी
के गले में अपने पिता-गुरू की सारी ख़ूबियाँ मौजूद हैं.वे जब जो गा रहीं है तो अपनी एक विशिष्ट छाप छोड़ देतीं हैं.अल्पायु में ही उन्हें नाम,शोहरत और प्रतिष्ठित मंच मिलने लग गए थे. आज सुर-पेटी पर राग मिश्र तिलंग में निबध्द भजन कौशिकी के स्वर में सुरभित हो रहा है. यह मीरा-भजन न जाने कितनी बार कितनी ही गायिकाओं से आपने सुना होगा लेकिन यहाँ कौशिकी के स्वरों का अंदाज़ ही कुछ निराला है.क्लासिकल म्युज़िक से जुड़े होने के बाद भी जब वे भजन गा रहीं हैं तो शब्द की शुध्दता को क़ायम रख रहीं हैं.जहाँ भी उन्होंने किसी पंक्ति को एक ख़ास घुमाव दिया है वहाँ वह लाज़मी सा लगता है. आइये कौशिकी को सुनें

Kaushiki Chakrabar...

Thursday, June 18, 2009

पिनाज़ मसानी की आवाज़ में एक सुन्दर भजन

यूँ उनका नाम ग़ज़ल की दुनिया में ज़्यादा लोकप्रिय है लेकिन आज सुनिये पिनाज़ मसानी की आवाज़ में एक भजन.
सखी भाव में पगा ये भजन गाने वाली पिनाज़ ने किराना घराने के वरिष्ठ संगीत साधक पं.फ़िरोज़ दस्तूर साहब से
बाक़ायदा क्लासिकल मूसीकी की तालीम ली और उन्हें विदूषी मधुरानी फ़ैजाबादी जैसी गुणी गुरू का सान्निध्य भी मिला.
मधुरानीजी ने पिनाज़ मसानी की आवाज़ की घड़ावन को परखते हुए उन्हें ग़ज़ल की ओर आने के लिये मुतास्सिर किया.

सुरपेटी पर आज बहुत दिनों बाद कुछ सुनाने का मन बना .
आइये बातें कम और सुर ज़्यादा का मान रखते हुए
पिनाज़ मसानी को सुनते हैं.