दूरदर्शन के सुनहरी दिनों की यादें दिल में हमेशा ठाठें मारतीं रहतीं हैं.इस दौरान पीनाज़ मसानी जो मूलत: ग़ज़ल के लिये अपनी ख़ास पहचान रखतीं हैं; कि ये प्यारी रचना यू ट्यूब पर हाथ लग गई.
फ़िरोज़ दस्तूर और मधुरानी जैसे गुरुजनों से तालीम पा चुकीं पीनाज़ मसानी इन दिनों ज़्यादा सुनाई नहीं दे रही हैं. ग़ौर करें कि यह गीत गाते हुए युवा पीनाज़ कितनी भीगी हुईं हैं. सारंगी,बाँसुरी,हारमोनियम और तबले का आसरा लेकर ये रचना कितनी सुरीली सुनाई पड़ रही है. दूरदर्शन और आकाशवाणी ने इन बरसों में जो गँवाया है वह अपनी जगह है लेकिन हम संगीतप्रेमियों का एक बड़ा नुकसान यह हुआ है कि सुगम संगीत विधा जिसे आगे बढ़ाने में आकाशवाणी का बहुत बड़ा योगदान रहा है,से हम वंचित रह हो गए हैं. जगजीतसिंह,मेहंदी हसन,हरिओम शरण,पंकज उधास से लेकर पीनाज़ मसानी तक न जाने कितने गूलूकार हमारे घरों और कानों तक रेडियो के ज़रिये ही पहुँचे हैं. नरेन्द्र शर्मा,उध्दवकुमार,मधुकर राजस्थानी और सुदर्शन फ़ाक़िर जैसे कितने ही नामों से हमारी पहचान रेडियो की सुगम संगीत महफ़िलों ने करवाई है. बहरहाल जो हुआ सो हुआ...आइये सुरपेटी पर पीनाज़ के कंठ से झर रही बौछार में भीग लिया जाए.
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Sunday, August 8, 2010
Sunday, December 27, 2009
कभी बिंदिया हँसे ,कभी नैन हँसे; नाहिद अख़्तर

इंटरनेट की रविवारीय सैर में ये गीत मुझे हाथ लगा. नाहिद अख़्तर की आवाज़ है और बहुत प्यारे बोल हैं. सबसे अच्छी बात मुझे यह लगी कि नाहिद आपा की आवाज़ में सुर की जो ख़ालिस सचाई है वह आजकल बहुत कम सुनाई देती है. दूसरी चीज़ इस गीत का कम्पोज़िशन है. पाकिस्तान से अमूमन हम सब ग़ज़लें,क़व्वालियाँ और लोक संगीत तो सुनते आए हैं लेकिन गीतों को भी बहुत लाजवाब धुन में ढ़ालने का एक सुरीला सिलसिला पाकिस्तान के कम्पोज़र्स के यहाँ सुनाई देता है. नाहिद अख़्तर की गाई हुई यह रचना उसी सुरीलेपन का पता देती है. समूह वॉयलिन,बाँसुरी,सारंगी और सरोद के साथ से सजी ये धुन कितनी मोहक और बेजोड़ बन पड़ी है, ज़रा सुन कर तो देखिये......
| Naheed Akhtar Kabi Bindia .mp3 | ||
| | ||
| Found at bee mp3 search engine |
Sunday, March 29, 2009
दिल में अब तक तेरी उल्फ़त का निशाँ बाक़ी है
ग़ज़ल के परचम को ऊँचा ले जाने वाले सर्वकालिक महान गुलूकार मेहंदी हसन साहब इन दिनों बहुत बीमार हैं.आर्थिक रूप से उन जैसा कलाकार इसलिये भी संकट में है कि उन्होंने कभी अपनी ज़िन्दगी को बहुत गंभीरता से लिया ही नहीं.भविष्य के लिये सोचने का मौक़ा उन जैसे कलाकारों को कम ही मिल पाता है. आज की पीढ़ी के तमाम कलाकार इस मामले में ज़्यादा सतर्क और सूझबूझ से काम ले रहे हैं. होता यह है कि क़ामयाबी के दौर में कलाकार बस अपने फ़न और प्रस्तुतियों पर ध्यान देना चाहता है. घर-गिरस्ती,स्वास्थ्य,भविष्य के लिये बचत , घर और दीगर सुविधाओं से बेख़बर कलाकार सोचता है अभी समय ठीक चल रहा है चलो अभी तो गाने में ही लगे रहें.समय तो ढलता ही है और शोहरत भी कम होती है. वक़्त के पहले यदि कलाकार ने अपने लिये रूपया-पैसा बचा रखा हो तो ठीक वरना वह सरकार की तरफ़ मुँह ताकता है. कलाकार की मरणासन्न अवस्था में परिजन सोचते हैं स्वास्थ्य के नाम पर सरकारी मदद को भुना ही लिया जाए. यदि सम्पत्ति बेतहाशा है तो अगली पीढ़ी एक दूसरे मरने-मारने तक पर आ जाती है. समझदारी का तक़ाज़ा है कि ऐसे हालात बने उसके पहले कलाकार को समझदारी से जीवन की संध्या बेला में महत्वपूर्ण निर्णय ले लेना चाहिये.लेकिन हम श्रोता तो सिर्फ़ अपने अज़ीज़ फ़नकारों के सुखी जीवन स्वास्थ्य के लिये दुआ कर सकते हैं.
मेहंदी हसन साहब के लिये पूरी दुनिया के संगीतप्रेमियों में सहानुभूति का भाव है और सभी लोग उनके लिये प्रार्थनारत हैं. मृत्यु जीवन की एक ऐसी सचाई है जिसे नकारा नहीं जा सकता है लेकिन चूँकि कलाकार जीवन भर हमारी ज़िन्दगी को तसल्ली बख्शने का काम करता है सो श्रोता उससे एक ख़ास रिश्ता बना लेता है. कभी कलाकार से मिला न हो,रूबरू सुना न हो लेकिन सिर्फ़ कैसेट,सीडी और रेडियो का आसारा लेकर ही वह अपने जीवन के सुख-दु:ख अपने महबूब फ़नकार की आवाज़ में तलाशता है. आप सोच रहे होंगे आज मेहंदी हसन साहब के हवाले से मैं लैक्चर देने के मूड में कैसे आ गया.नहीं जी ऐसा कुछ नहीं.ख़ाँ साहब की आवाज़ का जादू ही ऐसा है कि उनका ज़िक्र आते ही मन में बहुत सी बातें अनायास आ जातीं हैं. चलिये मेहंदी हसन के स्वास्थ्य लाभ की कामना करते हुए ये गीत सुन लेते हैं.(मेहंदी हसन साहब की अनेक नायाब ग़ज़लें आप सुख़नसाज़ पर भी सुन सकते हैं)
मेहंदी हसन साहब के लिये पूरी दुनिया के संगीतप्रेमियों में सहानुभूति का भाव है और सभी लोग उनके लिये प्रार्थनारत हैं. मृत्यु जीवन की एक ऐसी सचाई है जिसे नकारा नहीं जा सकता है लेकिन चूँकि कलाकार जीवन भर हमारी ज़िन्दगी को तसल्ली बख्शने का काम करता है सो श्रोता उससे एक ख़ास रिश्ता बना लेता है. कभी कलाकार से मिला न हो,रूबरू सुना न हो लेकिन सिर्फ़ कैसेट,सीडी और रेडियो का आसारा लेकर ही वह अपने जीवन के सुख-दु:ख अपने महबूब फ़नकार की आवाज़ में तलाशता है. आप सोच रहे होंगे आज मेहंदी हसन साहब के हवाले से मैं लैक्चर देने के मूड में कैसे आ गया.नहीं जी ऐसा कुछ नहीं.ख़ाँ साहब की आवाज़ का जादू ही ऐसा है कि उनका ज़िक्र आते ही मन में बहुत सी बातें अनायास आ जातीं हैं. चलिये मेहंदी हसन के स्वास्थ्य लाभ की कामना करते हुए ये गीत सुन लेते हैं.(मेहंदी हसन साहब की अनेक नायाब ग़ज़लें आप सुख़नसाज़ पर भी सुन सकते हैं)
Thursday, November 13, 2008
काँटा कोई दामन थामेगा जब जब याद मेरी आएगी

सितारा बन गए तो इसका मतलब ये नहीं कि किसी भी चीज़ को आप हल्के से लें.ये बात उस्ताद मेहंदी हसन साहब से सीखी जा सकती है.अब देखिये उन्होंने ग़ज़ल की दुनिया में तमाम ऊँचाईयाँ पा लेने के बाद भी किसी दीगर गायकी को भी पूरी गंभीरता से लिया. चाहे वह फ़िल्म म्युज़िक ही क्यों न हो. आज सुरपेटी पर मेहंदी हसन साहब तशरीफ़ लाए हैं. फ़िल्मी तराना होने के बावजूद ख़ाँ साहब की गायकी का नूर पूरी तरह मौजूद है. जैसे हम संसारी अपने ज़ेवरों को दमका के रखते हैं वैसे ही मेहंदी हसन अपने सुर से एक एक शब्द को माँज कर चमका देते हैं.मज़ा ये कि उनके गले से निकली शायरों के कलाम अलग ही दमकते नज़र आते हैं. चलिये गीत सुन लें....
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