
इंटरनेट की रविवारीय सैर में ये गीत मुझे हाथ लगा. नाहिद अख़्तर की आवाज़ है और बहुत प्यारे बोल हैं. सबसे अच्छी बात मुझे यह लगी कि नाहिद आपा की आवाज़ में सुर की जो ख़ालिस सचाई है वह आजकल बहुत कम सुनाई देती है. दूसरी चीज़ इस गीत का कम्पोज़िशन है. पाकिस्तान से अमूमन हम सब ग़ज़लें,क़व्वालियाँ और लोक संगीत तो सुनते आए हैं लेकिन गीतों को भी बहुत लाजवाब धुन में ढ़ालने का एक सुरीला सिलसिला पाकिस्तान के कम्पोज़र्स के यहाँ सुनाई देता है. नाहिद अख़्तर की गाई हुई यह रचना उसी सुरीलेपन का पता देती है. समूह वॉयलिन,बाँसुरी,सारंगी और सरोद के साथ से सजी ये धुन कितनी मोहक और बेजोड़ बन पड़ी है, ज़रा सुन कर तो देखिये......