Wednesday, January 13, 2010

चिरकुमार है यह प्रभाती:कुमार गंधर्व तराना

बीता दिन पं. कुमार गंधर्व की याद दिलाता रहा. 12 जनवरी को ही हमसे विदा हुए थे कुमारजी. लेकिन विदा कहाँ हुए. वे तो पूरे ठाठ से अपनी रसपूर्ण गायकी के साथ हमारे मन एक जीवंत दस्तावेज़ बन मौजूद हैं. अठारह बरस बाद भी हम कुमारजी को भूले नहीं. कबाड़ख़ाना पर जीवनसिंह ठाकुर का सुन्दर आलेख तो जारी कर ही चुका था, मन में ही बसे कुमारजी जैसे प्रतिप्रश्न कर बैठे कि भाई विदा होने के दूसरे दिन परभात्या (मालवी शब्द जो प्रभाती का सुरीला अपभ्रंश है)नहीं होना चाहिये क्या. सो लीजिये कुमारजी की ही मान लेते हैं और सुनते हैं राग श्री में निबध्द तराना....अहा! क्या तो सुरों की फ़ैंक है और क्या मदमस्त लयकारी. छोटी छोटी तानों से कुमार कैसे खेलते हैं जैसे कोई तितली एक ही पौधे पर खिले एक फूल से दूसरे फूल की सैर कर लेती है.
रेकॉर्डंग छोटी से है लेकिन मनभावन और अदभुत भी.सुनिये तो ज़रा....

(और हाँ समय हो तो कबाड़ख़ाना की सैर कल लीजियेगा;छोटा सा मगर अदभुत स्मृति-चित्र है)


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Sunday, December 27, 2009

कभी बिंदिया हँसे ,कभी नैन हँसे; नाहिद अख़्तर


इंटरनेट की रविवारीय सैर में ये गीत मुझे हाथ लगा. नाहिद अख़्तर की आवाज़ है और बहुत प्यारे बोल हैं. सबसे अच्छी बात मुझे यह लगी कि नाहिद आपा की आवाज़ में सुर की जो ख़ालिस सचाई है वह आजकल बहुत कम सुनाई देती है. दूसरी चीज़ इस गीत का कम्पोज़िशन है. पाकिस्तान से अमूमन हम सब ग़ज़लें,क़व्वालियाँ और लोक संगीत तो सुनते आए हैं लेकिन गीतों को भी बहुत लाजवाब धुन में ढ़ालने का एक सुरीला सिलसिला पाकिस्तान के कम्पोज़र्स के यहाँ सुनाई देता है. नाहिद अख़्तर की गाई हुई यह रचना उसी सुरीलेपन का पता देती है. समूह वॉयलिन,बाँसुरी,सारंगी और सरोद के साथ से सजी ये धुन कितनी मोहक और बेजोड़ बन पड़ी है, ज़रा सुन कर तो देखिये......

Naheed Akhtar Kabi Bindia .mp3
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