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Friday, September 12, 2008

आशा भोंसले की आवाज़ में मियाँ की मल्हार में तराना

कहते हैं भोर बेला में जीवन के सारे मनोरथ पूरे होते हैं.आज दिन की शुरूआत कुछ जल्दी हो गई और हाथ आ गई यह अनमोल बंदिश. आशा भोंसले जन्मोत्सव पर ब्लॉगर-बिरादरी के ज़रिये कई नायाब चीज़े सुनने को मिलीं लेकिन आज जो मिला उससे अच्छी स्वरांजलि सदी की इस महान गायिका को और क्या हो सकती है.

दो वर्ष पूर्व जब आशा जी से एक लम्बा दूरभाष इंटरव्यू किया था तब उन्होंने इस एलबम के बारे में बताया था. आप को भी बता दूँ : मैहर घराने के चश्मे-चिराग़ उस्ताद अली अकबर ख़ाँ साहब लिगैसी नाम से एक एलबम तैयार करना चाह रहे थे.कई नामचीन फ़नकारों से बात चली पर बनी नहीं क्योंकि ख़ाँ साहब एक कम्पोज़र के रूप में अपनी बात कहलवाना चाहते थे. शास्त्रीय संगीत के कलाकारों से कोई बैठक हो तो अपने मन की हो ही नहीं पाए. आशा भोंसले का ख़याल आया ज़हन में. पहली मुलाक़ात में ही बात बन गई. आशाजी ने बताया मैं ठहरी पार्श्वगायिका , जो संगीतकार कहे उसी को फ़ॉलो करना है. और देखिये क्या नायाब चीज़ सामने आई है.

मियाँ की मल्हार में निबध्द ये बंदिश उस्ताद अकबर अली ख़ाँ ने अपने मरहूम वालिद और गुरू बाबा अलाउद्दीन ख़ाँ से सीखी थी और ख़ुद इस तराने में आशा जी के साथ सरोद से जुगलबंदी की है. ये एलबम अदभुत था लेकिन पता नही ज़्यादा क्यों नहीं सुना गया. सरोद की तरबों पर तूफ़ान मचाते ख़ाँ साहब और अपने कोकिल-कंठ से अप्रतिम स्वराघात करतीं आशा भोंसले ...ज़रा ग़ौर फ़रमाएँ क्या तिलिस्म गढ़ दिया है इन महान कलाकारों ने.

मेरे शहर में मानसून विलम्ब से चल रहा है ; क्या मियाँ की मल्हार सुनाने के लिये ?


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Monday, September 8, 2008

ढलती रात में सुनिये आशाजी का ये अनसुना सा गीत.

सात्विक धुनों का जादू जगाने वाले संगीतकार रवीन्द्र जैन की बंदिश है यह.
राग मारवा के स्वर और आशा भोंसले की आवाज़.एक लम्हा लगता है सुनने वाले को जैसे संबोधित कर आशाजी कह रहीं है...साथी रे भूल न जाना मेरा प्यार..(फ़िल्म:कोतवाल साब)
चित्रपट संगीत के दायरे में मारवा का इस्तेमाल और उस पर आत्मा को चीरता सा आशा-स्वराघात.

आशाजी के गायन में तड़प और मुहब्बत की चाशनी झरी जाती है. गीत सुनेंगे तो सीने पर हाथ धरे रह जाएगा.शायद इस कम्पोज़िशन को सुन कर पूरी रात जागते रहें आप. क्योंकि जिस तरह से सारी पंक्तियाँ गाने के बाद मुखड़े पर आशाजी आतीं है तब लगता है पूरा जगत एक वीराना है और विकल करता यह स्वर जैसे हमसे ही एक वादा ले रहा है. शब्द सुनें और स्वर का मेल देखें तो लगता है ठंडक भी है और आग भी.

यूँ भी लगता है कि किसी हाई-वे पर आप बस में बैठ चुके हैं और सरसराती एक आवाज़ को आप सुन नहीं देख रहे हैं जो आपसे कह रही है साथी रे...भूल न जाना मेरा प्यार.
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Saturday, August 30, 2008

आशा भोंसले की आवाज़ में ये क्लासिकल रंग की बंदिश

भारतीय संगीत की पटरानी आशा भोंसले की आवाज़ की वर्सेटलिटि का जवाब नहीं.
उन्हें सिर्फ़ हिन्दी चित्रपट गीतों की सीमा में बांधना मूखर्ता ही होगी. गुजराती,मराठी,पंजाबी,राजस्थानी और अंग्रेज़ी तक में अपनी आवाज़ का जलवा बिखेर चुकीं आशाजी ने गायकी के क्षेत्र में एक लम्बी यात्रा तय की है. परिवार में ही संगीत का विराट स्वर मौजूद हो तब अपनी पहचान विकसित करना एक चुनौती होता है. कहना बेहतर होगा कि लताजी यदि संगीत की आत्मा हैं तो आशाजी उसकी देह हैं.
वेदना,मस्ती,उल्लास और अधात्म में पगे गीत जिस तरह से आशाजी के कंठ से निकले हैं वह विस्मयकारी है.
आज सुरपेटी पर प्रकाशित रचना मराठी नाटक मानपमान की ख्यात बंदिश है.इसे कम्पोज़ किया है वरिष्ठ संगीत-महर्षि पं.गोविंदराम टेम्बे ने.जब आप ये रचना सुन रहे होंगे तो महसूस करेंगे कि आशा भोंसले के रूप में हमारे चित्रपट संगीत ने एक महान स्वर पाया किंतु शास्त्रीय संगीत ने इसी कारण न जाने क्या अनमोल खोया.चलिये हिसाब-किताब बाद में करते रहेंगे अभी तो सुनिये आशाजी की तानें,मुरकिया और हरकतें कैसी बेजोड़ बन पड़ीं हैं.

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