दो वर्ष पूर्व जब आशा जी से एक लम्बा दूरभाष इंटरव्यू किया था तब उन्होंने इस एलबम के बारे में बताया था. आप को भी बता दूँ : मैहर घराने के चश्मे-चिराग़ उस्ताद अली अकबर ख़ाँ साहब लिगैसी नाम से एक एलबम तैयार करना चाह रहे थे.कई नामचीन फ़नकारों से बात चली पर बनी नहीं क्योंकि ख़ाँ साहब एक कम्पोज़र के रूप में अपनी बात कहलवाना चाहते थे. शास्त्रीय संगीत के कलाकारों से कोई बैठक हो तो अपने मन की हो ही नहीं पाए. आशा भोंसले का ख़याल आया ज़हन में. पहली मुलाक़ात में ही बात बन गई. आशाजी ने बताया मैं ठहरी पार्श्वगायिका , जो संगीतकार कहे उसी को फ़ॉलो करना है. और देखिये क्या नायाब चीज़ सामने आई है.
मियाँ की मल्हार में निबध्द ये बंदिश उस्ताद अकबर अली ख़ाँ ने अपने मरहूम वालिद और गुरू बाबा अलाउद्दीन ख़ाँ से सीखी थी और ख़ुद इस तराने में आशा जी के साथ सरोद से जुगलबंदी की है. ये एलबम अदभुत था लेकिन पता नही ज़्यादा क्यों नहीं सुना गया. सरोद की तरबों पर तूफ़ान मचाते ख़ाँ साहब और अपने कोकिल-कंठ से अप्रतिम स्वराघात करतीं आशा भोंसले ...ज़रा ग़ौर फ़रमाएँ क्या तिलिस्म गढ़ दिया है इन महान कलाकारों ने.
मेरे शहर में मानसून विलम्ब से चल रहा है ; क्या मियाँ की मल्हार सुनाने के लिये ?
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