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Monday, September 8, 2008

ढलती रात में सुनिये आशाजी का ये अनसुना सा गीत.

सात्विक धुनों का जादू जगाने वाले संगीतकार रवीन्द्र जैन की बंदिश है यह.
राग मारवा के स्वर और आशा भोंसले की आवाज़.एक लम्हा लगता है सुनने वाले को जैसे संबोधित कर आशाजी कह रहीं है...साथी रे भूल न जाना मेरा प्यार..(फ़िल्म:कोतवाल साब)
चित्रपट संगीत के दायरे में मारवा का इस्तेमाल और उस पर आत्मा को चीरता सा आशा-स्वराघात.

आशाजी के गायन में तड़प और मुहब्बत की चाशनी झरी जाती है. गीत सुनेंगे तो सीने पर हाथ धरे रह जाएगा.शायद इस कम्पोज़िशन को सुन कर पूरी रात जागते रहें आप. क्योंकि जिस तरह से सारी पंक्तियाँ गाने के बाद मुखड़े पर आशाजी आतीं है तब लगता है पूरा जगत एक वीराना है और विकल करता यह स्वर जैसे हमसे ही एक वादा ले रहा है. शब्द सुनें और स्वर का मेल देखें तो लगता है ठंडक भी है और आग भी.

यूँ भी लगता है कि किसी हाई-वे पर आप बस में बैठ चुके हैं और सरसराती एक आवाज़ को आप सुन नहीं देख रहे हैं जो आपसे कह रही है साथी रे...भूल न जाना मेरा प्यार.
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